वो देखता नहीं कि इधर देखता नहीं I
ईमान की तो ये है मुझे कुछ पता नहीं II
आतिश नहीं तो उसकी कोई बात ही चले,
उसके बग़ैर शेर मुझे सूझता नहीं I
हाँ गर्दिशे-मुदाम से घबरा गया था मैं,
आख़िर मैं आदमी था कोई देवता नहीं I
पलकों से जिसके खार चुने मैंने उम्र भर,
वो रहगुज़र थी उसकी मेरा रास्ता नहीं I
कहता हूँ आजकल उसे फ़ुर्सत कहां मियाँ,
कैसे कहूँ कि उससे मेरा वास्ता नहीं I
वो संगे-दर था उसका नज़र बारहा गई,
गो मुड़के देखने से कोई फ़ायदा नहीं I
महफ़िल से उठ चला है ख़मोशी के साथ सोज़,
क्या झूट बोलना कि अभी दिल भरा नहीं I
अपनों को दुःख है ग़म का मुदावा न कर सके,
ग़ैरों को कोफ़्त है कि तमाशा हुआ नहीं II
Tuesday, February 4, 2014
वो देखता नहीं कि इधर देखता नहीं / कांतिमोहन 'सोज़'
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