Pages

Sunday, February 9, 2014

अच्छा हुआ / केशव तिवारी

अच्छा हुआ कभी भी
इतना ऊँचा न हुआ मेरा माथ
कि टकराता किसी पहाड़ से
 
इतना नीचा भी नहीं कि
झुक झुक जाता जगह-जगह पर

अच्छा हुआ कभी भी
इतना सुन्दर न हुआ मैं
कि ढलती काया देख देख
दुखी होता

यह ठीक ही रहा तुमने
मनुष्य मानकर किया स्नेह
और मैं देवताओं के गुनाहों से
बच गया।

केशव तिवारी

0 comments :

Post a Comment