रात पर्दे से ज़रा मुहँ जो किसू का निकला
शोला समझता था उसे मैं पे भभूका निकला
महर ओ मह उस की फबन देख के हैरान रहे
जब वरक़ यार की तस्वीर-ए-दो-रू का निकला
ये अदा देख के कितनों का हुआ काम तमाम
नीमचा कल जो टुक उस अरबदा-जू का निकला
मर गई सर्व पे जब हो के तस्ददुक़ क़ुमरी
उस से उस दम भी न तौक़ अपने गुलू का निकला
‘मुसहफ़ी’ हम तो ये समझते थे के होगा कोई ज़ख़्म
तेरे दिल में तो बहुत काम रफ़ू का निकला
Friday, February 14, 2014
रात पर्दे से ज़रा मुहँ जो किसू का निकला़ / ग़ुलाम हमदानी 'मुसहफ़ी'
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