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Tuesday, February 4, 2014

हवा में हाँफ़ती उम्मीद की सूखी नदी रख दी / अनिरुद्ध सिन्हा

हवा में हाँफ़ती उम्मीद की सूखी नदी रख दी
तसल्ली के लिए हालात ने इतनी नमी रख दी ।

ग़लत को हम ग़लत कहते इसी कहने की कोशिश में
सियासत ने अंधेरों में हमारी हर ख़ुशी रख दी ।

खिलौना टूट जाने का उसे अफ़सोस तो होगा
कि जिसने प्यार के हर मोड़ पर दीवानगी रख दी ।

कहीं तो आँख से बचकर कहीं कोई बहाने से
कहीं ख़ामोश रातों में हमारी बेबसी रख दी ।

उसे तो नींद आती है कई सपने सुकूं देते
कि जिसके सामने हमने वफ़ा की रोशनी रख दी ।

अनिरुद्ध सिन्हा

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