किस गुनाह की सजा ये मिल रही है मुझे,
यही सवाल मुझे रात दिन सताता रहा |
ज़िक्र मेरा वो कभी चाहे करें या ना करें,
मेरा ख्याल उन्हें बार बार आता रहा |
ग़मों के पार भी तो ज़िन्दगी की बस्ती है,
अश्क बहते गए और मैं मुस्कुराता रहा |
सोचा के दिल की बात तुम्हें ख़त में बयां करूँ,
शब भर तेरा ही नाम लिखता मिटाता रहा |
Tuesday, February 4, 2014
किस गुनाह की सजा ये मिल रही है मुझे / आशीष जोग
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