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Saturday, February 8, 2014

आख़िर क्यों / अनिता ललित

ज़िन्दगी की सुबह
जिनके हौसलों से आबाद हुई,
शाम ढले क्यों ज़िन्दगी
उनसे ही बेज़ार हुई?

अनिता ललित

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