दुआ जो मेरी बेअसर हो गई
फिर इक आरज़ू दर बदर हो गई
वफ़ा हम ने तुझ से निभाई मगर
निगह में तेरी बेसमर[1] हो गई
तलाश ए सुकूँ में भटकते रहे
हयात अपनी यूंही बसर हो गई
कड़ी धूप की सख़्तियाँ झेल कर
थी ममता जो मिस्ले शजर[2] हो गई
न जाने कि लोरी बनी कब ग़ज़ल
"ज़रा आँख झपकी सहर हो गई"
वो लम्बी मसाफ़त[3] की मंज़िल मेरी
तेरा साथ था ,मुख़्तसर[4] हो गई
मैं जब भी उठा ले के परचम[5] कोई
तो काँटों भरी रहगुज़र[6] हो गई
’शेफ़ा’ तेरा लहजा ही कमज़ोर था
तेरी बात गर्द ए सफ़र[7] हो गई
Friday, February 7, 2014
ज़रा आँख झपकी सहर हो गई / इस्मत ज़ैदी
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