मुझे कल मेरा एक साथी मिला जिस ने ये राज़ खोला कि "अब जज्बा-ओ-शौक़ की वहशतों के ज़माने गए" फिर वो आहिस्ता-आहिस्ता चारों तरफ़ देखता मुझ से कहने लगा "अब बिसात-ए-मुहब्बत लपेटो जहां से भी मिल जाएं दौलत - समटो ग़र्ज कुछ तो तहज़ीब सीखो"
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