सरे-तन्हा[1] जब जब भी ईमान रोए
कहीं मुझमें फिर गीता क़ुरआन रोए
तड़पकर मिरे सारे अरमान रोए
मिरे साथ जीवन के मधुगान रोए
जुदाई की शब दिल-ए-नादान रोए
मुहब्बत के सारे ही सामान रोए
निगाहों के आँसू परेशान रोए
उमीदों के सारे ही इमकान रोए
फ़लक से न उतरे न दुख ही सुने वो
यहाँ चाहे जितना भी इन्सान रोए
जो फ़ितरत ही यूँ ढाए ज़ुल्मों सितम तो
क्यों न सबेरे उषा गान रोए
न लौटे किसी तौर अब वो मुसाफ़िर
रहे मुन्तज़िर-ए-तन्हा सुनसान रोए
शब्दार्थ:
- ↑ नितान्त अकेलापन


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