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Thursday, November 7, 2013

सरे तन्हा जब-जब भी ईमान रोए / उषा यादव उषा

सरे-तन्हा[1] जब जब भी ईमान रोए
कहीं मुझमें फिर गीता क़ुरआन रोए
 
तड़पकर मिरे सारे अरमान रोए
मिरे साथ जीवन के मधुगान रोए
 
जुदाई की शब दिल-ए-नादान रोए
मुहब्बत के सारे ही सामान रोए
 
निगाहों के आँसू परेशान रोए
उमीदों के सारे ही इमकान रोए
 
फ़लक से न उतरे न दुख ही सुने वो
यहाँ चाहे जितना भी इन्सान रोए
 
जो फ़ितरत ही यूँ ढाए ज़ुल्मों सितम तो
क्यों न सबेरे उषा गान रोए
 
न लौटे किसी तौर अब वो मुसाफ़िर
रहे मुन्तज़िर-ए-तन्हा सुनसान रोए


शब्दार्थ:
  1. नितान्त अकेलापन
उषा यादव उषा

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