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Friday, November 8, 2013

शब्दों की किरचें / अश्वघोष

मन में पड़े थे टूटे हुए शब्द
जब तक मैं उनको जोड़ता
चुभने लगीं शब्दों की किरचें

मुक्ति की छटपटाहट में
चिड़िया की तरह हाफँता मैं
सोचता रहा बचने की तरक़ीब
देता रहा दुहाई सम्बन्धों की
सहता रहा किरचों का वहशीपन

चाकू से भी तेज़
तकुए से भी अधिक नुकीली किरचें
बींधती रहीं मुझे अनहद तक

काश! मैंने न छुए होते टूटे हुए शब्द
तो वहीं पड़ी रहतीं किरचें
और अब तक तो उन पर
जम गई होती विस्मृतियों की धूल।

अश्वघोष

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