मैं तो समझा था जिस वक़्त मुझ को वो मिलेंगे तो जन्नत मिलेगी
क्या ख़बर थी रह-ए-आशिक़ी में साथ उन के क़यामत मिलेगी
मैं नहीं जानता था कि मुझ को ये मोहब्बत की क़ीमत मिलेगी
आँसुओं का ख़ज़ाना मिलेगा चाक़-दामन की दौलत मिलेगी
फूल समझे ने थे ज़िंदगानी इस क़दर ख़ूब-सूरत मिलेगी
अश्क़ बन कर तबस्सुम मिलेगा दर्द बन कर मसर्रत मिलेगी
मेरी रूसवाइयों पे न ख़ुश हो मेरी दीवानगी को दुआ दो
तुम को जितनी भी शोहरत मिलेगी सिर्फ़ मेरी बदौलत मिलेगी
दिल हमारा न तोड़ो ख़ुदा-रा वरना खो दोगे अपना सहारा
ज़र्रे ज़र्रे में इन आईने के तुम को अपनी ही सूरत मिलेगी
उन के रूख़ से नक़ाब आज उट्ठेगी अब नज़ारों की मेराज होगी
एक मुद्दत से आज अहल-ए-ग़म को मुस्कराने की मोहलत मिलेगी
कैसे साबित क़दम वो रहेगा उस की तौबा का क्या हल होगा
जिस को सुनते हैं शैख़-ए-हरम से मय-कशीं की इजाज़त मिलेगी
Monday, November 11, 2013
मैं तो समझा था जिस वक़्त मुझ को वो मिलेंगे तो जन्नत मिलेगी / अनवर मिर्जापु
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