बीरज में जहाँ खता है, अति खरा है खेत ।
खेत सदा बल देत है, बीज बदल ना देत ।।
बीज बदल ना देत चाहे अमृत बरसावे ।
चिन[1] से चावल नहीं खेत करके दिखलाव ।।
गंगादास कहें वेद धरम से होता धीरज ।
चाहे धरण डिग जाय, कदी बदले ना बीरज ।।
बीरज में जहाँ खता है, अति खरा है खेत ।
खेत सदा बल देत है, बीज बदल ना देत ।।
बीज बदल ना देत चाहे अमृत बरसावे ।
चिन[1] से चावल नहीं खेत करके दिखलाव ।।
गंगादास कहें वेद धरम से होता धीरज ।
चाहे धरण डिग जाय, कदी बदले ना बीरज ।।
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