कँज से चरण देव गढ़ी से गुलफ शुभ ,
कदली से जँघ कटि सिँघ पँहुचत है ।
नाभि है गँभीर व्याल रोमावली कुँभ कुच ,
भुज ग्रीव भाय कैसी ठोढ़ी बिलसत है ।
मुख चँद बिम्बाधर चौका चारु सुक नाक ,
मीन नैन भौँहन बँकाई अधिकत है ।
भाल आधो बिधु भाग करन अमृत कूप ,
बेनी पिक बैनीजू की भूमि परसत है ।
रीतिकाल के किन्हीं अज्ञात कवि का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।
Monday, November 11, 2013
कँज से चरण देव गढ़ी से गुलफ शुभ / अज्ञात कवि (रीतिकाल)
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