व्यवस्था भी बहुत ज़्यादा नहीं है
जतन जोखम बहुत हैं
आगे जो जंगल है वो
उस से भी ज़्यादा गुंजलक है
तपस्या के ठिकाने
ज्ञान के मंतर
ध्यान की हर एक सीढ़ी पर
वही मूरख
अजब सा जाल ताने बैठा है युगों से
न जाने क्यूँ
मेरे रावण से उस को
पराजय का ख़तरा है
तो यूँ करता हूँ
अब के ख़ुद को ख़ुद से त्याग देता हूँ
Tuesday, November 12, 2013
व्यवस्था भी बहुत ज़्यादा नहीं है / ख़ालिद कर्रार
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