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Wednesday, November 20, 2013

कोई भाषा नहीं / अनुराग वत्स

तुम्हारे होठों पर सर्जरी के बाद छूट गई खरोंच का तर्ज़ुमा मैं 'दाग़ अच्छे हैं'
करता था जैसे बहुत ख़ुश को तुम 'कुछ मीठा हो जाए' कहा करती थी ।
विज्ञापनी भाषा की सारी चातुरी की ऐसी-तैसी कर हम वस्तुओं की जगह
ख़ुद को कितनी आसानी से नत्थी कर लेते थे और हमारी ख़ुशी ने उस बेहोश वक़्त में
'प्रेम न हाट बिकाय' कभी हम पर ज़ाहिर नहीं होने दिया ।
जबकि तुम जिन वज़हों से सुन्दर और क़रीबतर थीं उन वजहों की कोई भाषा नहीं ।

अनुराग वत्स

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