क्या क्या पापड़ बेल चुके हैं अब ग़म से घबराना क्या I
खेल तो सारे खेल चुके हैं अब जी का बहलाना क्या II
तू तो हमारा साथ निभाता तू तो वफ़ा का हामी था
तेरे बिना अब ए ग़मे-जानां जीना क्या मर जाना क्या I
आप अगर नाराज़ न हों तो एक सवाल हमारा है
हाथों पर जब ख़ार उगे हों ज़ख्मों को सहलाना क्या I
हम न कहेंगे कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे जीवन-भर
नादां को समझाए मूरख दाना को समझाना क्या I
हमसे न कीजे मीठी बातें उसकी हमें दरकार नहीं
आगज़नीं जब करनी ठहरी पानी डाल बुझाना क्या I
पहलू में रक्खा हो पत्थर सर में भरी हो आतिशे-ज़र
उस महफ़िल में शेर सुनाकर मुफ़्त लहू गरमाना क्या I
चाक करो अब अपना दामन सोज़ वगरना खैर नहीं
नंगों की बस्ती में आकर नंगों से शरमाना क्या II
Tuesday, November 5, 2013
क्या क्या पापड़ बेल चुके हैं अब ग़म से घबराना क्या / कांतिमोहन 'सोज़'
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