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Thursday, November 21, 2013

मैं समय का गीत / ओम धीरज

मै समय का गीत
लिखना चाहता,
चाहता मैं गीत लिखना आज भी

जब समय संवाद से है बच रहा
हादसा हर वक्त कोई रच रहा
साथ अपनी छोड़ती परछाईयाँ
झूठ से भी झूठ कहता सच रहा
शत्रु होते
इस समय के पृष्ठ पर
’दूध-जल’-सा मीत लिखना चाहता

जाल का संजाल बुनती उलझनें,
नीड़ सपनों के अभी हैं अधबुने
हाथ में हैं हाथ जिनके हम दिये
गाय की माने बधिक ही वे बने
अब गुलामी
के बने कानून की
मुक्ति का संगीत लिखना चाहता

बाड़ ही जब बाग को है खा रहा
पेड़ आरे का पॅवारा गा रहा
आग लेकर अब हवाएँ आ रहीं
दृश्य फिर भी हर किसी को भा रहा
हट सके गाढ़े
तिमिर का आवरण
आत्मचेता दीप लिखना चाहता

जब सहोदर रक्त के प्यासे बने
माँ-पिता भी जैविकी खाॅचे बने
जिदंगी क्लब के जुआघर में बिछी
नेह के रिश्ते जहाँ 'पासे’ बने
मर रहे आँसू
नयन के कोर में
मैं सजल उम्मीद लिखना चाहता।

ओम धीरज

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