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Sunday, November 17, 2013

खुले में आवास (कविता) / कमलेश

वहाँ, उस खुले में ही तुम्हारा घर है ।

खुले के हर ओर फैला महावन है
सघन लता-गुल्मों, वृक्षों, झाड़ी-झँखाड़ से
गूंजित हिंस्र पशुओं की अमुखर चीख़ों से
अलँघ्य राहों पर लुप्त पदचिह्नों से ।

खुला अभी बचा है वन के फैलाव से
धरती पर कच्छप पीठ-सा उठा हुआ
अजानी, अदेखी, संकरी पगडण्डी है
पैतृक आवाज़ें वहां ले आती हैं ।

खुले में निर्भय घूमते मृगशावक
गोधूली बेला में गौएँ रंभाती हैं
दूर आकाश में उठ रही धूम-शिखा
फैल रहा शुचित मन का सुवास है ।

वहां, उस खुले में ही तुम्हारा घर है ।

कमलेश

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