अब सिवा मेरे कहीं उसका गुज़ारा भी नहीं I
देख वो रुक गया गो मैंने पुकारा भी नहीं II
बच गया आज तो कल उसको भुला भी दूंगा
अब तो दिल को मेरे यादों का सहारा भी नहीं I
खत्म अफ़साना हुआ लुत्फ़ो-करम का यारो
अब वो मायल भी नहीं मुझको गवारा भी नहीं I
रात के थाल को उलटा के वो काफ़ूर हुआ
सांवली शब के कने एक सितारा भी नहीं I
सोज़ यूं बैठ के क़िस्मत को न कोसो अपनी
क्या वो खुश है जिसे तक़दीर ने मारा भी नहीं II
Tuesday, November 19, 2013
अब सिवा मेरे कहीं उसका गुज़ारा भी नहीं / कांतिमोहन 'सोज़'
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