कैसा रिश्ता है इस मकान के साथ
बात करता हूँ बेज़बान के साथ
आप तन्हा जनाब कुछ भी नहीं
तीर जचता है बस कमान के साथ
हर बुरे वक़्त पर नज़र उट्ठी
क्या तअल्लुक है आसमान के साथ
दुश्मनी थी तो कुछ तो हासिल था
छिन गया सारा कुछ अमान के साथ
थे ज़मीं पर तो ठीक-ठाक था सब
पर बिखरने लगे उड़ान के साथ
एक इंसाँ ही सो रहा है फ़क़त
कुल जहाँ उठ गया अजान के साथ
ना सही मानी हर्फ़ ही से सही
एक निस्बत तो है कुरान के साथ
Friday, November 22, 2013
कैसा रिश्ता है इस मकान के साथ / 'अना' क़ासमी
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