क्या ऐसे कम-सुख़न[1] से कोई गुफ़्तगू[2] करे
जो मुस्तक़िल[3] सुकूत[4] से दिल को लहू करे
अब तो हमें भी तर्क-ए-मरासिम[5] का दुख नहीं
पर दिल ये चाहता है के आगाज़[6] तू करे
तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत[7] है ज़िन्दगी
खुद को गँवा के कौन तेरी जुस्तजू करे
अब तो ये आरज़ू है कि वो जख़्म[8] खाइये
ता-ज़िन्दगी[9] ये दिल न कोई आरज़ू करे
तुझ को भुला के दिल है वो शर्मिंदा-ए-नज़र[10]
अब कोई हादिसा[11] ही तेरे रु-ब-रू [12]करे
चुपचाप अपनी आग में जलते रहो "फ़राज़"
दुनिया तो अर्ज़े--हाल[13] से बे-आबरू[14] करे
Monday, November 18, 2013
क्या ऐसे कम-सुख़न से कोई गुफ़्तगू करे / फ़राज़
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