(1)
खुद ही सरशारे - मये- उल्फत1 नहीं होना 'असर',
इससे भर-भर कर दिलों के जाम छलकाना भी है।
(2)
खुद मेरी जौके-असीरी2 ने मुझे रखा असीर3,
उसने तो कैदे-मुहब्बत से किया आजाद भी।
(3)
खूगरे - दर्द4 हो अगर इन्सां,
रंज में भी मजा है राहत का।
(4)
खूने- हजार - हसरतो - अरमाँ के बावजूद,
उसकी नजर में हम न समाये तो क्या करें?
(5)
खूबिए-नाज5 तो देखो कि उसी ने न सुना,
जिसने अफसाना बनाया मेरे आफसाने को।
Friday, November 8, 2013
शेर-4 / असर लखनवी
Subscribe to:
Post Comments
(
Atom
)


0 comments :
Post a Comment