ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी महकते मन्दिर से नाक़ूस की1 आवाज़ आती है?
क्या अब भी मुक़द्दस2 मस्जिद पर मस्ताना अज़ां3 थर्राती है?
और शाम के रंगी सायों पर अ़ज़्मत की4 झलक छा जाती है?
ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी वहाँ के पनघट पर पनहारियाँ पानी भरती हैं?
अँगड़ाई का नक़्शा बन-बन कर सब माथे पे गागर धरती हैं?
और अपने घरों को जाते हुए हँसती हुई चुहलें करती है?
ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी वहां मेलों में वही बरसात का जोबन होता है?
फैले हुए बड़ की शाखों में झूलों का निशेमन होता है?
उमड़े हुए बादल होते हैं छाया हुआ सावन होता है?
ओ देस से आने वाले बता!
क्या शहर के गिर्द अब भी है रवाँ5 दरिया-ए-हसीं6 लहराए हुए?
ज्यूं गोद में अपने मन7 को लिए नागन हो कोई थर्राये हुए?
या नूर की8 हँसली हूर की गर्दन में हो अ़याँ9 बल खाये हुए?
ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी किसी के सीने में बाक़ी है हमारी चाह? बता
क्या याद हमें भी करता है अब यारों में कोई? आह बता
ओ देश से आने वाले बता लिल्लाह10 बता, लिल्लाह बता
Wednesday, October 23, 2013
ओ देस से आने वाले बता! / 'अख्तर' शीरानी
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