जाड़ा आते ही वह उपेक्षिता पत्नी सी
याद आती है
अरसे के बाद हम घर के कबाड़ से
उसे मुस्कान के साथ निकाल लाते हैं
कांगड़ी उस समय
अपना शाप मोचन हुआ समझती है
उस की तीलियों से बुनी
देह की झुर्रियों में
समय की पड़ी धूल
हम फूँक कर उड़ाते हैं
ढीली तीलियों में कुछ नई तीलियाँ भी डलवाते हैं।
वह समझती है
कि दिन फिरने लगे हैं
हम देर तक रहने वाले कोयले पर
उस में आंच डालते हैं
धीरे धीरे उत्तेजित हो कर
फूटने लगता है उस की देह से संगीत
जिसे अपनी ठंड की तहों में
उतारने के लिए हम
उसे एक आत्मीयता के साथ
अपने चोगे के अन्दर वहशी जंगल में लिए फिरते हैं।
और जब रात को बुझ जाती है कांगड़ी
हम अनासक्त से हो कर
उसे सवेरे तक
अपने बिस्तर से बाहर कर देते हैं
कांगड़ी अवाक् देखती है हमें रात भर
आदमी हर बार
ज़रूरत के मौसम में उसे फुसलाता है
परन्तु नहीं सोचता कभी वह
उलट कर उस के बिस्तर में
भस्म कर जाएगी सदा की बेहूदगियाँ।
Monday, October 7, 2013
कांगड़ी / अग्निशेखर
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