बड़े से बड़े दरजी के भी
बस में नहीं है
प्रेम का सही-सही नाप लेना।
क्षणिक होते है
प्रेम की काया के दर्शन
जो किसी को
दिखते हुए भी नहीं दिखता
और नहीं सुहाता किसी को फूटी आंख।
अपने-अपने फीतों से लेना चाहते है
सबके सब
अलग-अलग नाप
उद्धव बेचारा कितना ही फिर लें
ज्ञान की पोटली माथे पे रख
ब्रज की गली-गली।
उद्धव के कांधे पर रखे
बारह खाटों के बाण से भी
नहीं नापे जा सके
प्रेम पगी गोपियों के अंतस्।
चौरासी कोस की परिक्रमा है
प्रेम का सही नाप
Tuesday, October 15, 2013
नाप / ओम नागर
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