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Friday, October 4, 2013

पल्लू की कोर दाब दाँत के तले / उमाकांत मालवीय

पल्लू की कोर दाब दाँत के तले
कनखी ने किये बहुत वायदे भले ।

कंगना की खनक
पड़ी हाथ हथकड़ी ।
पाँवों में रिमझिम की बेडियाँ पड़ी ।
सन्नाटे में बैरी बोल ये खले,
हर आहट पहरु बन गीत मन छले ।

नाजों में पले छैल सलोने पिया,
यूँ न हो अधीर,
तनिक धीर धर पिया ।
बँसवारी झुरमुट में साँझ दिन ढले,
आऊँगी मिलने मैं पिय दिया जले ।

उमाकांत मालवीय

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