दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं
लोग अब मुझ को तेरे नाम से पहचानते हैं
आईना-दार-ए-मोहब्बत हूँ के अरबाब-ए-वफ़ा
अपने ग़म को मेरे अंजाम से पहचानते हैं
बादा ओ जाम भी इक वजह-ए-मुलाक़ात सही
हम तुझे गर्दिश-ए-अय्याम से पहचानते हैं
पौफटे क्यूँ मेरी पलकों पे सजाते हो उन्हें
ये सितारे तो मुझे शाम से पहचानते हैं
Sunday, October 13, 2013
दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं / क़तील
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