(1)
फिर हम कहाँ, कहाँ तुम, जी भर के देखने दो,
अल्लाह, कितनी मुद्दत तुमसे जुदा रहे हैं।
(2)
बसा फूलों की नकहत1 में लिये मस्ती शराबों की,
महकता, लहलहाता एक काफिर2 का शबाब3 आया।
(3)
बहाना मिल न जाए बिजलियाँ को टूट पड़ने का,
कलेजा कांपता है आशियाँ को आशियाँ कहते ।
(4)
बू-ए-वफा न फूटे कहीं उनको यह खौफ है,
फूलों से ढक रहे हैं, हमारे मजार को।
(5)
मस्त आंखों पर घनी पलकों की छाया यूँ थी,
जैसे कि हो मैखाने4 पर घरघोर घटा छाई हुई।
Tuesday, October 8, 2013
शेर-13 / असर लखनवी
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