अर्श के तारे तोड़ के लाएँ काविश लोग हजार करें
‘मीर’ की बात कहाँ से पाएँ आख़िर को इक़रार करें
आप इसे हुस्न-ए-तलब मत समझें ना कुछ और शुमार करें
शेर इक ‘मीर’ फ़क़ीर का हम जो आप के गोश गुज़ार करें
आज हमारे घर आया लो क्या है जो तुझ पे निसार करें
इल्ला खींच बग़ल में तुझ को देर तलक हम प्यार करें
कब की हमारे इश्क़ की नौबत क़ैस से आगे जा पहुँची
रस्मन लोग अभी तक उस मरहूम का ज़िक्र अज़कार करें
दुर्ज-ए-चश्म में अश्क के मोती ले जाने हैं उन के हुज़ूर
चोखा रंग लहू का दे कर और उन्हें शहवार करें
दीन ओ दिल ओ जाँ सब सरमाया जिस में अपना सर्फ़ हुआ
इश्क़ ये कारोबार नहीं क्या और जो कारोबार करें
जितने भी दिल रीश हैं उस के सब को नामे भेज बुला
उस बे-मेहर वफ़ा दुश्मन की यादों का दरबार करें
Saturday, March 1, 2014
अर्श के तारे तोड़ के लाएँ काविश लोग हजार करें / इब्ने इंशा
बेटियों का गीत / अनिल जनविजय
मैं मौन रहूँ
तुम गाओ
- जैसे फूले अमलतास
- तुम वैसे ही
- खिल जाओ
जीवन के
अरुण दिवस सुनहरे
नहीं आज
तुम पर कोई पहरे
- जैसे दहके अमलतास
- तुम वैसे
- जगमगाओ
कुहके जग-भर में
तू कल्याणी
मकरंद बने
तेरी युववाणी
- जैसे मधुपूरित अमलतास
- तुम सुरभि
- बन छाओ
रचनाकाल : 2007
मिनौती / अपर्णा भटनागर
हर नारी मिनौती है.. यहाँ दृश्य अरुणाचल का है, इसलिए बाँस, धान, सूरज, सीतापुष्प, पहाड़ के बिम्ब भी उसी प्रदेश के हैं। बरई, न्यिओगा वहाँ के लोक जीवन से जुड़े गीत हैं- जैसे हम बन्ना-बन्नी, आला, बिरहा से जुड़े हैं... इस संगीत को बाँसों से जोड़ा है.. जैसे बाँस के खोखल से निसृत होकर ये मिनौती की आत्मा में पैठ गए हैं... नारी के मन और आत्म को समझाते हुए पुरुष से अंतिम प्रश्न पर कविता समाप्त होती है...
मेरे बाँस
पहचानते हो मिनौती[1] को
तुम्हारी और मेरी आत्मा एक सरीखी है-
इस खोखल से
सर्र-सर्र करती हवाओं ने बजना सीखा है
छिल-छिल कर सरकंडों में गुँथी
जीवन की टोकरियाँ
जिनमें वे भर सके
आराम ..
आज भी तुम्हारी बाँसुरी से
गुज़र जाते हैं
बरई, न्यिओगा[2]
मेरी सलवटों में उलझे
कितनी तहों के भीतर
छलकते आँसुओं की तलौंछ के नीचे
दबे-दबे से स्वर
मेरे सीतापुष्प[3]
तुम्हे याद होगा मेरा स्पर्श-
अपने कौमार्य को
सुबनसिरी[4] में धोकर
मलमल किया था
और घने बालों में तुम
टँक गए थे
तब मेरी आत्मा का प्रसार उस सुरभि के साथ
बह चला था
एक वसंत जिया था दोनों ने
मिट्टी तुम क्यों घूर रही हो -
इन झुर्रियों के नीचे
अभी भी सूरज जलता है [5]
जिसके दाह से
तुम प्रसव करती रही हो
क्षिप्र सफ़ेद धान का
जैसे धूप सफ़ेद होती है
तुम्हारे बीज से
मेरी प्रसव पीड़ा से
धैर्य पाया था सृजन का
चीड़-चिनार में खोए पहाड़
तुम्हारी हरी पटरियों पर
मेरे चुप पैर आहट देते रहे हैं
ताकि तुम्हारा खोयापन
अकेला न रह जाए
इस विशाल समृद्धि में
तुम्हारा विस्तार मेरी सीमाओं में बँधता रहा है
अपने होने की मीमांसा करोगे ?
मेरा चुप रहना ही ठीक ।
सकूत-ए-शाम-ए-ख़िज़ाँ है क़रीब आ जाओ / फ़राज़
सकूत-ए-शाम-ए-ख़िज़ाँ है क़रीब आ जाओ
बड़ा उदास समाँ है क़रीब आ जाओ
न तुमको ख़ुद पे भरोसा न हमको ज़ोम-ए-वफ़ा
न ऐतबार-ए-जहाँ है क़रीब आ जाओ
राह-ए-तलब में किसी को ध्यान नहीं
हुजूम-ए-हमसफ़राँ है क़रीब आ जाओ
जो दश्त-ए-इश्क़ में बिछड़ें वो उम्र भर न मिले
यहाँ धुआँ ही धुआँ है क़रीब आ जाओ
ये आँधियाँ हैं तो शहर-ए-वफ़ा की ख़ैर नहीं
ज़माना ख़ाकफ़शाँ है क़रीब आ जाओ
फ़ाक़िह-ए-शहर की मजलिस नहीं के दूर रहो
ये बज़्म-ए-पीर-ए-मग़ाँ है क़रीब आ जाओ
"फ़राज़" दूर के सूरज ग़रूब समझे गये
ये दौर-ए-कमनज़ारा है क़रिब आ जाओ
चाँदनी चुपचाप सारी रात / अज्ञेय
चाँदनी चुपचाप सारी रात-
सूने आँगन में
जाल रचती रही ।
मेरी रूपहीन अभिलाषा
अधूरेपन की मद्धिम-
आँच पर तचती रही ।
व्यथा मेरी अनकही
आनन्द की सम्भावना के
मनश्चित्रों से परचती रही ।
मैं दम साधे रहा
मन में अलक्षित
आँधी मचती रही ।
प्रात बस इतना कि मेरी बात
सारी रात
उघड़ कर वासना का
रूप लेने से बचती रही ।
आइये इक पहर यहीं बैठें / अमित
आइये इक पहर यहीं बैठें
साथ सूरज के ढलें सुरमई अंधेरों में
सुने बेचैन परिन्दों की चहक
लौट कर आते हुये फिर उन्ही बसेरों में
आशियाँ सबको हसीं लगता है अपना, लेकिन
बस मुकद्दर में सभी के मकाँ नहीं होता
और हैरत है कि मस्रूफ़ियाते-दीगर में
इस कमी का मुझे कोई गुमाँ नहीं होता
उम्र कटती ही चली जाती है
इन दरख़्तों के तले, बेंच पे, फुटपाथों पर
कितने ही पेट टिके हैं देखें
दौड़ती पैर की जोड़ी पे और हाथों पर
रोज़ सूरज को जगाता हूँ सवेरे उठकर
रात तारों के दिये ढूँढ कर जलाता हूँ
वक़्ते-रुख़्सत की वो आँखें उभर सी आती हैं
जाने कितने ही ख़यालों में डूब जाता हूँ
ज़िन्दगी छोटी है, तवील भी है
मसअला भी है, इक दलील भी है
छोड़िये ये फ़िज़ूल की बहसें
आइये इक पहर यहीं बैठें
शब्दार्थ:
मसरूफ़ियाते-दीगर = अन्य व्यस्तताओं में
वक़्ते-रुख़्सत = विदा के समय
तवील = लम्बी
मसअला = समस्या
दलील = युक्ति
भुला दूँ कैसे मैं उसकी क़यामत खेज़ नज़रों को / अबू आरिफ़
भुला दूँ कैसे मैं उसकी क़यामत खेज़ नज़रों को
कि जिन से जीस्त के उजडे चमन में फिर बहार आई
लिखूँ तफसीर कैसे उसके मैं हर हर तबस्सुम की
कि मैं भी मयकदे से देखने दीवाना वार आई
चमन में जब गुलों ने ज़िक्र छेड़ा उनकी आमद का
कदमं बोसी को आई है सबा मस्तानापार आई
बड़ी बेकैफ गुजरी है जुदाई की स्याह रातें
नसीम सुभ जो आई तो खबर खुशगवार आई
तकल्लुफ जान लेवा है यही आरिफ को बतला दो
चलो अब मयकदे क आई शाम-ए-इन्तज़ार आई
शब ख़्वाब के ज़जीरों में हँस कर गुज़र गई / अम्बर बहराईची
शब ख़्वाब के ज़जीरों में हँस कर गुज़र गई
आँखों में वक़्त-ए-सुब्ह मगर धूल भर गई
पिछली रूतों में सारे शजर बारवर तो थे
अब के हर एक शाख़ मगर बे-समर गई
हम भी बढ़े थे वादी-ए-इज़हार में मगर
लहजे के इंतिशार से आवाज़ मर गई
तुझ फूल के हिसार में इक लुत्फ़ है अजब
छू कर जिसे हवा-ए-तरब-ए-मोतबर गई
दिल में अजब सा तीर तराज़ू है इन दिनों
हाँ ऐ निगाह-ए-नाज़ बता तू किधर गई
मक़्सद सला-ए-आम है फिर एहतियात क्यूँ
बे-रंग रौज़नों से जो ख़ुशबू गुज़र गई
उस के दयार में कई महताब भेज कर
वादी-ए-दिल में इक अमावस ठहर गई
अब के क़फ़स से दूर ही मौसमी हवा
आज़ाद ताएरों के परों को कतर गई
आँधी ने सिर्फ़ मुझ को मुसख़्खर नहीं किया
इक दश्त-ए-बे-दिली भी मिरे नाम कर गई
फिर चार-सू कसीफ़ धुएँ फैलने लगे
फिर शहर की निगाह तेरे क़स्र पर गई
अल्फ़ाज़ के तिलिस्म से ‘अम्बर’ को है शग़फ़
उस की हयात कैसे भला बे-बुनर गई

