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Saturday, March 1, 2014

बच्चों की नाव में / कुमार रवींद्र

आओ
चलें यात्रा पर
बच्चों की जादू की नाव में

नाव यह
बनाई है बच्चों ने
भोली मुस्कानों से
चिड़ियों के पंखों से
सीपी से
लहरों की तानों से

रेती पर
बालू के घर बने
टापू पर खेल रहे हैं बच्चे छाँव में

बच्चों की डोंगी में
परियाँ हैं
सूरज है - चांद है
हिरनों के छौने हैं
जंगल है
शेरों की मांद है

नाचेंगे
मिलकर ये सारे ही
पहुंचेगी डोंगी जब सपनों के गाँव में

वहाँ मिलेंगे हमको
लोग खड़े
इंद्रधनुष के पुल पर
नाव घाट लगते-ही
हमें लगेगा जैसे
आ पहुंचे अपने घर


वहीं
ढ़ाई आखर के मेले हैं
हम-तुम खो जाएँगे उसी ठाँव में।

कुमार रवींद्र

कल और आज / गजानन माधव मुक्तिबोध

अभी कल तक गालियाँ
देते थे तुम्हें
हताश खेतिहर,

अभी कल तक
धूल में नहाते थे
गौरैयों के झुंड,

अभी कल तक
पथराई हुई थी
धनहर खेतों की माटी,

अभी कल तक
दुबके पड़े थे मेंढक,
उदास बदतंग था आसमान !

और आज
ऊपर ही ऊपर तन गये हैं
तुम्हारे तंबू,

और आज
छमका रही है पावस रानी
बूंदा बूंदियों की अपनी पायल,

और आज
चालू हो गई है
झींगुरों की शहनाई अविराम,

और आज
जोर से कूक पड़े
नाचते थिरकते मोर,

और आज
 आ गई वापस जान
दूब की झुलसी शिराओं के अंदर,

और आज
विदा हुआ चुपचाप ग्रीष्म
समेट कर अपने लाव-लश्कर ।

गजानन माधव मुक्तिबोध

उपदेश की महिमा / कबीर

काल काल तत्काल है, बुरा न करिये कोय |
अन्बोवे लुनता नहीं, बोवे तुनता होय ||


काल का विकराल गाल तुमको तत्काल ही निगलना चाहता है, इसीलिए किसी प्रकार भी बुराई न करो | जो नहीं बोया गया है, वह काटने को नहीं मिलता, बोया ही कटा जाता है |


या दुनिया में आय के, छाड़ि दे तू ऐंठ |
लेना होय सो लेइ ले, उठी जात है पैंठ ||


इस संसार में आकर तुम सब प्रकार के अभिमान को छोड़ दो, जो खरीदना हो खरीद लो, बाजार उठा जाता है |


खाय पकाय लुटाय के, करि ले अपना काम |
चलती बिरिया रे नरा, संग न चले छदाम ||


पका - खा और लुटाकर, अपना कल्याण कर ले | ऐ मनुष्य ! संसार से कूच करते समय, तेरे साथ एक छदाम भी नहीं जायेगा |


सह ही में सत बाटई, रोटी में ते टूक |
कहै कबीर ता दास को, कबहुँ न आवै चूक ||


जो सत्तू में से सत्तू और रोटी में से टुकड़ा बाँट देता है, वह भक्त अपने धर्म से कभी नहीं चूकता |


देह खेह होय जागती, कौन कहेगा देह |
निश्चय कर उपकार ही, जीवन का फन येह ||


मरने के बाद तुमसे कौन देने को कहेगा ! अतः निश्चयपूर्वक परोपकार करो, येही जीवन का फल है |


धर्म किये धन ना घटे, नदी ना घट्टै नीर |
अपनी आँखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर ||


धर्म (परोपकार, दान, सेवा) करने से धन नहीं घटता, देखो नदी सदैव रहती है, परन्तु उसका जल घटता नहीं | धर्म करके स्वय देख लो |


या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत |
गुरु चरनन चित लाइये, जो पूरन सुख हेत ||


इस संसार का झमेला दो दिन का है अतः इससे मोह - संबध न जोड़ो | सतगुरु के चरणों में मन लगाओ, जो पूर्ण सुख देने वाला है |


ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय |
औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय ||


मन के अहंकार को मिटाकर, ऐसे और नम्र वचन बोलो, जिससे दूसरे लोग सुखी हों और खुद को भी शान्ति मिले |


कहते को कहि जान दे, गुरु की सीख तू लेय |
साकट जन औ श्वान को, फिरि जवाब न देय ||


उल्टी - पुल्टी बात बोलने वाले लो बोलते जाने दो तू गुरु की ही शिक्षा धारण कर | साकट (दुष्टों) तथा कुत्तों को उलटकर उत्तर न दो |


इष्ट मिले अरु मन मिले, मिले सकल रस रीति |
कहैं कबीर तहँ जाइये, यह सन्तन की प्रीति ||


उपस्य, उपासना - पद्धति, सम्पूर्ण रीति - रिवाज़ और मन जहाँ पर मिलें, वहीं पर जाना सन्तो को प्रियेकर होना चहिये |


बहते को मत बहन दो, कर गहि ऐचहु ठौर |
कहो सुन्यो मानौ नहीं, शब्द कहो दुइ और ||


बहते हुए को मत बहने दो, हाथ पकड़कर उसको मानवता की भूमिका पर निकाल लो | यदि वह कहा - सुना ना माने, तो भी निर्णय के दो वचन और सुना दो |

कबीर

जिसपे तेरा इताब हो जाए / अब्दुल मजीम ‘महश्‍र’

जिसपे तेरा इताब हो जाए
उसका जीना अज़ाब हो जाए

उनके चेहरे को देख ले जो भी
उसका चेहरा गुलाब हो जाए

उनकी यादें जो दिल में बस जाएँ
ज़िन्दगी लाजवाब हो जाए

या-इलाही तिरी मुहब्बत में
ज़िन्दगानी शराब हो जाए

उनका दिल जीत लो तो ऐ ‘महशर’
हर ख़ता का हिसाब हो जाए

अब्दुल मजीम ‘महश्‍र’

दो बूँदें ओस की / एम० के० मधु

पहाड़ से गिरती
पत्थरों से चोट खाती
वह नदी सूख चुकी है

पलक की कोर से
दो बूँदें ओस की
उठा सको तो उठा लो

आँसुओं के सैलाब को
पानी की ज़रूरत है

समय का सूर्य
और गर्म होने वाला है

एम० के० मधु

करने वाले काम / असद ज़ैदी

वापस खींचो सारे छुरे
जो तुमने घोंपे थे पसलियों के बीच
हँसली के ऊपर गुर्दों के आसपास
लौटाओ लोगों को मुर्दाघरों से
इमर्जेंसी वार्ड में जहाँ नाइट ड्यूटी पर लगे
दो उनींदे डाक्टर तुम्हारे किसी शिकार को
बचाने की कोशिश कर रहे हैं
वे ऐसे तो उसे बचा नहीं पाएँगे

खींचकर वापस लाओ वहाँ से भी उन सब मरते हुए लोगों को
बिठाओ उन्हें उनकी बैठकों और काम की जगहों में
सुनो उनसे उनके पसंदीदा मज़ाक़

जब उनमें से किसी की औरत चाय लेकर आए
तो हस्बे-.मामूल बोलो नमस्ते भाभी
और कोई बच्चा-.बच्ची झाँकते दिखाई दें तो
बुलाओ और कहो देखो ये रहे तुम्हारे पापा

वापस लो अपनी चश्मदीद गवाहियाँ
जिनका तुमने रिहर्सल किया था
बताओ कि इबारत और दीद भयानक धोखा थीं
और याददाश्त एक घुलनशील ज़हर

फिर से लिखो अपना
सही सही नाम और काम

उन समाचारों को फिर से लिखो
जो अफ़वाहों और भ्रामक बातों से भरे थे
कि कुछ भी अनायास और अचानक नहीं था
दुर्घटना दरअसल योजना थी

मत पोंछो हर जगह से अपनी उंगलियों के निशान
छुड़ाओ अपने बालों से वह बेहूदा ख़िज़ाब

फिर से बनाओ वही हथेलियाँ
जो पसीजती थीं एक मासूम पशुता से
और मनुष्यता के ताप से

असद ज़ैदी

दरवाज़ा / अनामिका

मैं एक दरवाज़ा थी
मुझे जितना पीटा गया
मैं उतना ही खुलती गई।
अंदर आए आने वाले तो देखा–
चल रहा है एक वृहत्चक्र–
चक्की रुकती है तो चरखा चलता है
चरखा रुकता है तो चलती है कैंची-सुई
गरज यह कि चलता ही रहता है
अनवरत कुछ-कुछ !
... और अन्त में सब पर चल जाती है झाड़ू
तारे बुहारती हुई
बुहारती हुई पहाड़, वृक्ष, पत्थर–
सृष्टि के सब टूटे-बिखरे कतरे जो
एक टोकरी में जमा करती जाती है
मन की दुछत्ती पर।

अनामिका

चलो इश्क़ नहीं चाहने की आदत है / फ़राज़

चलो ये इश्क़ नहीं चाहने की आदत है
कि क्या करें हमें दू्सरे की आदत है

तू अपनी शीशा-गरी का हुनर न कर ज़ाया[1]
मैं आईना हूँ मुझे टूटने की आदत है

मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँ नहीं आता
मैं क्या करूँ के तुझे देखने की आदत है

तेरे नसीब में ऐ दिल सदा की महरूमी[2]
न वो सख़ी[3] न तुझे माँगने की आदत है

विसाल[4] में भी वो ही है फ़िराक़[5] का आलम
कि उसको नींद मुझे रत-जगे की आदत है

ये मुश्क़िलें हों तो कैसे रास्ते तय हों
मैं ना-सुबूर[6] उसे सोचने की आदत है

ये ख़ुद-अज़ियती कब तक "फ़राज़" तू भी उसे
न याद कर कि जिसे भूलने की आदत है

अहमद फ़राज़