सिर्फ़ बस्ती के उजड़ने से नहीं
सिर्फ़ आदमी के मरने से नहीं
सिर्फ़ गाछ के उखड़ने से नहीं
एक पत्ती के झड़ने से भी फ़र्क पड़ता है
Wednesday, January 1, 2014
फ़र्क पड़ता है / कृष्णमोहन झा
तुम से बेरंगी-ए-हस्ती का गिला करना था / अली सरदार जाफ़री
तुम से बेरंगी-ए-हस्ती का गिला करना था
दिल पे अंबार है ख़ूँगश्ता तमन्नाओं का
आज टूटे हुए तारों का ख़याल आया है
एक मेला है परेशान सी उम्मीदों का
चन्द पज़मुर्दा बहारों का ख़याल आया है
पाँव थक थक के रह जाते हैं मायूसी में
पुरमहन राहगुज़ारों का ख़याल आया है
साक़ी-ओ-बादा नहीं जाम-ओ-लब-ए-जू भी नहीं
तुम से कहना था कि अब आँख में आँसू भी नहीं
पेड़ / ओम पुरोहित ‘कागद’
आपने
एक अभियान में
पेड़ लगाया
दूसरे में सींचा
और
तीसरे में
काट डाला ।
ठीक है
आप मालिक थे, पेड़ के
लेकिन जबाब देना ही पड़ेगा
जिस ने पेड़ को जमाया
जो पत्ते फूटने से लेकर
पेड़ काटने तक
मौन थी
वह धरती
उस पेड़ की क्या थी ?
अनुवाद : नीरज दइया
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है / अदम गोंडवी
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए
ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए
छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर ग़रीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मज़हबी नग्मात को मत छेड़िए
झिलमिल सितारों का आँगन होगा / आनंद बख़्शी
रफ़ी:
झिलमिल सितारों का आँगन होगा
रिमझिम बरसता सावन होगा
ऐसा सुंदर सपना अपना जीवन होगा
लता:
झिलमिल सितारों का आँगन होगा ...
रफ़ी:
प्रेम की गली में एक छोटा सा घर बनाएंगे
कलियाँ ना मिले ना सही काँटों से सजाएंगे
बगियाँ से सुंदर वो बन होगा
रिमझिम बरसता सावन होगा
लता:
झिलमिल सितारों का आँगन होगा
रफ़ी:
रिमझिम बरसता सावन होगा
लता:
तेरी आँखों से सारा संसार मैं देखूँगी
देखूँगी इस पार या उस पार मैं देखूँगी
नैनों को तेरा ही दर्शन होगा
रिमझिम बरसता सावन होगा
लता:
झिलमिल सितारों का आँगन होगा
रफ़ी:
रिमझिम बरसता सावन होगा
रफ़ी:
फिर तो मस्त हवाओं के हम झोके बन जाएंगे
लता:
नैना सुन्दर सपनों के झरोखे बन जाएंगे
मन आशाओं का दर्पण होगा
रिमझिम बरसता सावन होगा
दोनों:
रिमझिम सितारों कासावन होगा
झिलमिल सितारों काअ सावन होगा
रोएंगी ये आँखें फिर भी मैं तो मुस्कुराऊँगी
दुःख के तूफ़ानों से भी मैं ना घबराऊँगी
जब साथ मेरे मेरा साजन होगा
रिमझिम बरसता सावन होगा
ख़ामोश न रहिये कोई बात कीजिये / अबू आरिफ़
ख़ामोश न रहिये कोई बात कीजिये
तन्हा जो किया करते थे अब साथ कीजिये
वो शाम तवील और वह लम्हें इन्तिज़ार
अपनी स्याह ज़ुल्फ़ों से ही रात कीजिये
ये बात दिगर है कि खिलवत कदे में है
आये है तो उनसे मुलाकात कीजिये
क्या कुछ छुपा के रखा है उस नशतर-एदिल में
करना है राज़ फ़ाश तो एक साथ कीजिये
आरिफ़ ने अगर छेड़ दी है अगर अन्जुमन की बात
फिर आप ही तनहाइयों की बात कीजिये
दिन के उजाले में डांस पार्टी वाली लड़की / कुमार सुरेश
जो गई थी मुंबई हीरोइन बनने
बन गई कस्बाई मेलों में फ़िल्मी गानों पर
डांस करने वाली लड़की
जो सर्कस के जोकर की तरह
चेहरे पर बहुत सारा मेकअप लगाकर
हर उदासी को
छुपाने में माहिर है
रंगीन लाइटों की लुका-छिपी में
शोहदों की सीटियों के कोरस में
फ़िल्मी गानों की धुनों पर
लट्टू की तरह नाचते हुए
अदाओं से दर्शकों को उन्मत्त करती है
जिसके इशारों की आँच से
शो का तम्बू पिघल जाता है
वही लड़की दिन के उजाले में
साधारण उदास लड़की बन जाती है
उसके चेहरे पर
इंसानियत के चेहरे पर उभरी
खरोचों की तरह
असमय झुर्रियाँ उभर आई हैं
उसकी माँ
किसी छोटे गाँव में अपनी छोटी बेटियों
की परवरिश और ख़ुद की दवा के लिए
उसके भेजे मनीआर्डर की राह देखती रहती है
दिन के उजाले में
डांस पार्टी वाली लड़की
बदल जाती है
बेजान पत्थर में
और रात होने का इंतज़ार करती है
ज़िंदा होने के लिए
कुछ मिरे शौक़ ने दर-पर्दा कहा हो जैसे / एहतिशाम हुसैन
कुछ मिरे शौक़ ने दर-पर्दा कहा हो जैसे
आज तुम और ही तस्वीर-ए-हया हो जैसे
यूँ गुज़रता है तिरी याद की वादी में ख़याल
ख़ारज़ारों में कोई बरहना-पा हो जैसे
साज़ नफ़रत के तरानों से बहलते नहीं क्यूूँ
ये भी कुछ अहल-ए-मोहब्बत की ख़ता हो जैसे
वक़्त के शोर में यूँ चीख़ रहे हैं लम्हे
बहते पानी में कोई डूब रहा हो जैसे
कैसी गुल-रंग है मशरिक़ का उफ़ुक़ देख नदीम
नदी का ख़ूँ रात की चौखट पे बहा जो जैसे
या मुझे वहम है सुनता नहीं कोई मेरी
या ये दुनिया ही कोई कोह-ए-निदा हो जैसे
बहर-ए-ज़ुल्मात-ए-जुनूँ में भी निकल आई है राह
इश्क़ के हाथ में मूसा का असा हो जैसे
दिल ने चुपके से कहा कोशिश-ए-नाकाम के बाद
ज़हर ही दर्द-ए-मोहब्बत की दवा हो जैसे
देखें बच जाती है या डूबती है कश्ती-ए-शौक़
साहिल-ए-फ़िक्र पे इक हश्र बपा हो जैसे

