Pages

Sunday, December 1, 2013

नई सदी में टहलते हुए / आत्मा राम रंजन

भागते समय से ताल बिठाना
बदलती सदी को कुशलता से फलांगना
वह है अनाम घुड़्दौड़ का
एक समर्थ घोड़ा
तीव्र में तीव्रतर गति
टहलने निकलने का उसका ख़्याल
अपने आप में सुखद है सांसों के लिए
और जीवन के लिए भी
नई सदी के पहले पड़ाव पर
टहलने निकला है वह
स्वत: ही दौड़ते से जा रहे
इसके क़दम उसकी अंगुली थामे है
एक बच्चा
बच्ची होने की संभावनाओ की
गर्म हत्याओं के बाद
लिया है जिसने जन्म

बोलता जा रहा लगातार
बड़बड़ाता सा खींचता हुआ उसकी कमीज़
नहीं विक्षिप्त नहीं है बच्चा
दरअसल सुनने वाले कानो में
चिपका हुआ है मोबाईल
और वे मग्न है अपनी दुनिया में
आँखें भी हैं आगे ही आगे
बच्चे से कहीं ऊँची खीजता हुआ
रूआँसा बच्चा चुप है अब गुमसुम
ढीली पड़ती जा रही
अंगुली पर उसकी पकड़
वह सोच रहा एक और विकल्प
पापा के साथ टहलने से तो अच्छा था
घर पर बी.डी.ओ. गेम खेलना
उसका इस तरह सोचना
इस सदी का एक ख़तरनाक हादसा है
बहुत ज़रूरी है कि कुछ ऐसा करें
कि बना रहे यह अँगुलियों का स्नेहिल स्पर्श
और जड़ होती सदी पर
यह नन्हीं स्निग्ध पकड़
कि बची रहे
पकड़ जितनी नर्म ऊष्मा
ताकि बची रहे यह पृथवी।

आत्मा राम रंजन

तीन कहानियाँ / क़तील

कल रात इक रईस की बाँहों में झूमकर,
लौटी तो घर किसान की बेटी ब-सद मलाल1
ग़ैज़ो-ग़जब से2 बाप का खूँ खौलने लगा,
दरपेश3 आज भी था मगर पेट का सवाल।

कल रात इक सड़क पे कोई नर्म-नर्म शै,
बेताब मेरे पाँव की ठोकर से हो गई,
मैं जा रहा था अपने खयालात में मगन,
हल्की-सी एक चीख़ फ़ज़ाओं में4 खो गई।

कल रात इक किसान के घर से धुआँ उठा,
बस्ती में ग़लग़ला5-सा हुआ-आग लग गई,
इस रंज से किसान का दिल पाश-पाश था,
रक्साँ6 थी चौधरी के लबों पर मगर हँसी।

क़तील शिफ़ाई

जिस्म में जाँ की तरह मैंने बसाया तुमको / अज़ीज़ आज़ाद

जिस्म में जाँ की तरह मैंने बसाया तुमको
अपने एहसास की परतों में समाया तुमको

ख़ुश्क मिट्टी हूँ मिले प्यार की हलकी-सी नमी
ये ही उम्मीद लिए अपना बनाया तुमको

तुम मिले जब भी ज़माने की हवा बन के मिले
मैंने हर बार ही बदला हुआ पाया तुमको

मुझ से यूँ बच के निकलते हो गुनाह हूँ जैसे
मेरा साया भी कभी रास न आया तुमको

तेरी ख़ुशबू को हवा बन के बिखेरा मैंने
जाने दिल रूहे-चमन मैंने बनाया तुमको

दौरे-गर्दिशे के ये झोंके न रुलादें ऐ ‘अज़ीज़’
मैंने हर मोड़ पे बाँहों में छुपाया तुमको

अज़ीज़ आज़ाद

रहना नहिं देस बिराना है / कबीर

रहना नहिं देस बिराना है।
यह संसार कागद की पुडिया, बूँद पडे गलि जाना है।
यह संसार काँटे की बाडी, उलझ पुलझ मरि जाना है॥
यह संसार झाड और झाँखर आग लगे बरि जाना है।
कहत 'कबीर सुनो भाई साधो, सतुगरु नाम ठिकाना है॥

कबीर

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब' / ग़ालिब

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री
हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे

ग़ालिब

बज़ाहिर प्यार की दुनिया में जो नाकाम होता है / अदम गोंडवी

बज़ाहिर प्यार की दुनिया में जो नाकाम होता है
कोई रूसो कोई हिटलर कोई खय्याम होता है

ज़हर देते हैं उसको हम कि ले जाते हैं सूली पर
यही हर दौर के मंसूर का अंजाम होता है

जुनूने-शौक में बेशक लिपटने को लिपट जाएँ
हवाओं में कहीं महबूब का पैगाम होता है

सियासी बज़्म में अक्सर ज़ुलेखा के इशारों पर
हकीकत ये है युसुफ आज भी नीलाम होता है

अदम गोंडवी

अपना मन होता है / कमलेश भट्ट 'कमल'


उस पर जाने किस किसका तो बंधन होता है
अपना मन भी आखिर कब अपना मन होता है ।

तन से मन की सीमा का अनुमान नहीं लगता
तन के भीतर ही मीलों लम्बा मन होता है ।

वह भी क्या जानेगा सागर की गहराई को
जिसका उथले तट पर ही देशाटन होता है ।

अँधियारा क्या घात लगाएगा उस देहरी पर
जिस घर रोज उजालों का अभिनन्दन होता है ।

दुख की भाप उठा करती हैसुख के सागर से
ऐसा ही, ऐसा ही शायद जीवन होता है ।

हम-तुम सारे ही जिसमें किरदार निभाते हैं
पल-पल छिन-छिन उस नाटक का मंचन होता है ।

तन की आँखें तो मूरत में पत्थर देखेंगी
मन की आँखों से ईश्वर का दर्शन होता है ।

कमलेश भट्ट 'कमल'

हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहाँ तक आ गए / 'क़ाबिल' अजमेरी

हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहाँ तक आ गए
हम नज़र तक चाहते थे तुम तो जाँ तक आ गए

ना-मुरादी अपनी किस्मत गुमरही अपना नसीब
कारवाँ की खैर हो हम कारवाँ तक आ गए

उन की पलकों पर सितारे अपने होंटों पे हँसी
किस्सा-ए-गम कहते कहते हम कहाँ तक आ गए

रफ्ता-रफ्ता रंग लाया जज्बा-ए-खामोश-ए-इश्क
वो तगाफुल करते करते इम्तिहाँ तक आ गए

खुद तुम्हें चाक-ए-गिरेबाँ का शुऊर आ जाएगा
तुम वहाँ तक आ तो जाओ हम जहाँ तक आ गए

आज ‘काबिल’ मय-कदे में इंकिलाब आने को है
अहल-ए-दिल अंदेशा-ए-सूद-ओ-जियाँ तक आ गए

'क़ाबिल' अजमेरी