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Tuesday, October 1, 2013

टोकनी / अशोक वाजपेयी

यकायक पता चला कि टोकनी नहीं है
पहले होती थी
जिसमें कई दुख और
हरी-भरी सब्ज़ियाँ रखा करते थे
अब नहीं है...
दुख रखने की जगहें
धीरे-धीरे कम हो रही हैं ।

अशोक वाजपेयी

मौन का हाथ / अरुणा राय

पुकारने पर
प्रति-उत्तर ना मिले
तो बाहर नहीं भटकूंगी अब
बल्कि लौटूंगी
भीतर ही

हृदयांधकार में बैठा
जहाँ
जल रह होगा तू
वहीं
तेरी मद्धिम आँच में बैठ
गहूंगी
तेरे मौन का हाथ।

अरुणा राय

चक्रान्त शिला – 9 / अज्ञेय

जो बहुत तरसा-तरसा कर मेघ से बरसा

हमें हरसाता हुआ,
-माटी में रीत गया।
आह! जो हमें सरसाता है
वह छिपा हुआ पानी है
हमारा इस जानी-पहचानी


माटी के नीचे का।
-रीतता नहीं बीतता नहीं।
अज्ञेय

हुज़ूर-ए-यार में हर्फ़ इल्तिजा के / अमजद इस्लाम

हुज़ूर-ए-यार में हर्फ़ इल्तिजा के रक्खे थे
चराग़ सामने जैसे हवा के रक्खे थे

बस एक अश्क-ए-नदामत ने साफ़ कर डाले
वो सब हिसाब जो हम ने उठा के रक्खे थे

सुमूम-ए-वक़्त ने लहजे को ज़ख़्म ज़ख़्म किया
वगरना हम ने क़रीने सबा के रक्खे थे

बिखर रहे थे सो हम ने उठा लिए ख़ुद ही
गुलाब जो तेरी ख़ातिर सजा के रक्खे थे

हवा के पहले ही झोंखे से हार मान गए
वही चराग़ जो हम ने बचा के रक्खे थे

तुम ही ने पाँव न रक्खा वगरना वस्ल की शब
ज़मीं पे हम ने सितारे बिछा के रक्खे थे

मिटा सकी न उन्हें रोज़ ओ शब की बारिश भी
दिलों पे नक़्श जो रंग-ए-हिना के रक्खे थे

हुसूल-ए-मंज़िल-ए-दुनिया कुछ ऐसा काम न था
मगर जो राह में पत्थर अना के रक्खे थे

अमजद इस्लाम अमजद

दृश्य घाटी में / ओम प्रभाकर

बीत गए दिन

फूल खिलने के।


होती हैं केवल वनस्पतियाँ
हरी-हरी-सी
हर गली
हर मोड़ पर बैठी
मौत अपनी बाँह फैलाकर।
बर्फ़-सा
जमता हुआ हर शख़्स
चुप्पियों में क़ैद हैं साँसें,
समय की नंगी सलीबों पर
गले में अटकी हुईं फाँसें,
लिख रहे हैं
लोग कविताएँ
नींद की ज्यों गोलियाँ खाकर।
बीत गए दिन
अब हवाओं में गन्धकेतु हिलने के
फूल खिलने के।

ढोती है काले पहाड़ दृष्टियाँ
सूर्य झर गए,
दृश्य घाटी में गहरे उतर गए,
बीत गए दिन
उठी बाँहों से बाँहों के मिलने के
फूल खिलने के।
ओम प्रभाकर

हर मुलाकात के बाद / अरुणा राय

जो चीज हममें
कामन थी
वो था हमारा भोलापन
और बढता गया वह
हर मुलाकात के बाद
पर दुनिया हमेशा की तरह
केवल सख्‍तजां लोगों के लिए
सहज थी
सो हमारा सांस लेना भी
कठिन होता गया

और अब हम हैं

मिलते हैं तो गले लग रोते हैं
अपना आपा खोते हैं
फिर मुस्‍कुराते हंसते
और विदा होते हैं

अरुणा राय

कुछ काले कोट / कुँअर बेचैन

जहाँ जाकर खत्म होती हैं दिशायें / अमित

जहाँ जाकर खत्म होती हैं दिशायें,
क्या वहाँ दीवार होगी?
क्या नहीं दीवार के उस पार भी होंगी दिशायें?
कल हुआ सूर्यास्त नभ के जिस निलय में,
शून्य का रक्‍ताभ आँचल है कहाँ?
ढूँढते हम जिसे उद्‍गम में विलय में,
सृष्टि का वह आदि कारण है कहाँ?
क्या निरर्थक प्रश्न सार्थक उत्तरों की खोज में,
पहुँच जाते समारोहों, गोष्ठियों में, भोज में?
हृदय कोई बन्‍द परिपथ
याकि तहखाना तिलिस्मी
एक भय अज्ञात सा मन में समाया।
नहीं खुलती ग्रंथि, बंद कपाट,
है उस पार क्या? कब जान पाया।
हम कलश की रुप संरचना, सजावट या कला के,
मुग्ध आलोचक, प्रशंसक या परीक्षक
नहीं कर पाते तनिक श्रम
झाँक कर देखें, कि,
इसके मध्य है क्या?

अमिताभ त्रिपाठी ‘अमित’