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Tuesday, December 9, 2014

वह परवाज़ / अवनीश सिंह चौहान

धूप सुनहरी, माँग रहा है
रामभरोसे आज

नदी चढ़ी है
सागर गहरा
पार उसे ही करना
सोच रहा वह
नैया छोटी
और धार पर तिरना

छोटे-छोटे चप्पू मेरे
साहस-धीरज-लाज

खून-पसीना
बो-बोकर वह
फसलें नई उगाए
तोता-मैना की
बातों से
उसका मन घबराए

चिड़ियाँ चहकें डाल-डाल पर
करें पेड़ पर राज

घड़ियालों का
अपना घर है
उनको भी तो जीना
पानी तो है
सबका जीवन
जल की मीन-नगीना

पंख सभी के छुएँ शिखर को
प्रभु दे, वह परवाज़

अवनीश सिंह चौहान

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